भारत में कब बना पहला कफ सीरप, क्या अफीम खाकर करते थे खांसी का इलाज?

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इन दिनों सोशल मीडिय पर यह खबर आग की तरह फैल रही है कि भारत में बने कफ सीरप को पीने से पश्चिमी अफ्रीकी देश गांबिया में कई बच्चों की मौत हो गई है। बताया जा रहा है कि यह कफ सीरप हरियाणा स्थित एक दवा कंपनी ने बनाया है। इसके बाद विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इस सीरप को न पीने की चेतावनी जारी कर दी है।

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पहला कफ सीरप

ऐसे में यह सवाल उठता है कि आखिर कफ सीरप को पहली बार कब बनाया गया था और उससे पहले खांसी को ठीक करने के लिए किस तरह का इलाज किया जाता था। खास तौर पर खांसी के लिए बनाया गया कफ़ सीरप दरअसल पहली बार 127 साल पहले जर्मन दवा कंपनी बेयर ने बाज़ार में उतारा था। इस कफ सीरप को हेरोइन नाम से बेचा जाता था।   

खांसी के लिए अफीम का होता था इस्तेमाल

बताया जाता है कि कफ सीरप के बनने से पहले लोग खांसी को ठीक करने के लिए अफीम का इस्तेमाल किया करते थे। बेयर कंपनी ने जिस वक्त कफ सीरप को लॉन्च किया तो उनका भरोसा था कि हेरोइन नाम का यह कफ सीरप लोगों की खांसी को पूरी तरह ठीक कर सकता है। इतना ही नहीं, इस कफ सीरप से दमा और निमोनिया जैसी बीमारियों में भी राहत मिलती थी। इसके अलावा, खांसी से जुड़ी कई तरह की बीमारियों में भी यह कफ सीरप लोगों को फायदा पहुंचा रही थी। लेकिन वहीं बहुत से लोग ऐसे थे जो अब भी खांसी के लिए अफीम का इस्तेमाल किया करते थे। ऐसे में डॉक्टरों ने लोगों को अफीम से बनी दवाओं से निजात दिलाने के लिए हेरोइन दवा देनी शुरू कर दी।

मगर साल 1899 में लोगों ने यह कहकर हेरोइन का विरोध शुरू कर दिया कि उन्हें इसकी लत लगती जा रही है। इसके बाद साल 1913 में हेरोइन कफ सीरप के उत्पादन बदं हो गया।

वहीं बात भारत की कि जाए तो उस वक्त यहां आयुर्वेद से बनी जड़ी बूटियों और घरेलू उपचारों से वैध और हकीम कफ सीरप बनाया करते थे।

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